Loding...

  रेशम संचालनालय सामान्य जानकारी

हमारे बारे में:

रेशम गतिविधयॉ राज्य स्थापना से प्रारंभ की गई थीं । गतिविधियों का संचालन उद्योग विभाग के अंतर्गत प्रारंभ में मुखयतः मालवांचल तथा होशंगाबाद क्षेत्र में प्रारंभ किया गया था । वर्ष 1977 से अगस्त 1984 तक गतिविधियॉं का संचालन मध्य प्रदेश राज्य वस्त्र निगम के अधीन रहा । 1 सितंबर 1984 को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत पृथक से रेशम संचालनालय का गठन किया गया । 1986 में ग्रामोद्योग विभाग का गठन किया गया एवं रेद्गाम विभाग 1986 से ग्रामोद्योग विभाग के अधीन कार्यरत है ।

दृष्टि :
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धन परिवार के आर्थिक सामाजिक असंतुलन को दूर करने के लिये शासन प्रतिबद्ध है । संचालनालय द्वारा क्रियान्वित योजनाओं का मुखय उद्देश्य ग्रामीण, भूमिहीन कृषक एवं आदिवासी बहुल जिलों के गांवों में ऐसे परिवारों को आजीविका के बेहतर साधन, संस्थान और अवसर उपलब्ध करना है जिनके पास या तो बहुत कम संसाधन है या जो संसाधन विहीन है ।

उद्देश्य:

प्रदेश के ग्रामीण अंचल में निवास करने वाले आदिवासी तथा अन्य गरीब तबके के लोगो को रेशम उद्योग के माध्यम से स्वरोजगार उपलब्ध करना । कोसा उद्योग के अन्तर्गत नैसर्गिक प्रजाति का प्रगुणन एवम् पालित प्रजाति की गतिविधियों को बढ़ावा देना तथा इस कार्य से जुड़े लोगों की आय में वृद्धि करना । योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु स्थानीय हितग्राहियों का चयन कर समहित समूह बना कार्य सम्पादन करना । रेशम उत्पादन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देना । उन्नत किस्म के बीच उत्पादन हेतु रेशम बीज उत्पादन हेतू रेशम बीज केन्द्रों व ग्रेनेज का वैज्ञानिक पद्धति से सुदृढ़ीकरण करना । शहतूत, टसर, इरी पौधरोपण को बढ़ावा देना । नवीन तकनीकी से रेशमी घागों के उत्पादन में गुणात्मक सुधार लाना । कौशल उन्नयन तथा तकनीकी हस्तांतरण का निरन्तर प्रयास ।



मुख्यतः रेशम चार प्रकार के होते है


1-मलबरी रेशम - खाद्य वृक्ष शहतूत

रेशम कृमि का पालन घरो के अन्दर नियंत्रित वातावरण में किया जाता है । इसका भवन के अन्दर पालन होता है । खाद्य पत्तियाँ morus alba प्रजाति की खाद्य होती है । यह फसल मुख्यतः कृषकों द्वारा अपने निजी भूमि पर की जाती है । वर्ष में 3 से 5 फसल तक ली जा सकती है । अधिकतम आय कृषकों द्वारा म.प्र. में 1,75,000/- एकड़ रिकार्ड की गई है ।




2 -टसर रेशम -खाद्य वृक्ष अर्जुन एव साजा

टसर (wild silk) को सामान्य भाषा में कोसा कहते हैं। इसे "वन्या सिल्क " भी कहते हैं । यह semi domesticated (पालित) एवं wild रूप मैं पाया जाता हैं semi domesticated (पालित) का पालन हितग्राहियों के माध्यम से साजा, अर्जुन के वृक्षों पर किया जाता हैं । प्राकृतिक रूप से जंगली टसर साल के वृक्षो पर पाया जाता हैं । पालित अथवा domesticated टसर के प्राथमिक खाध पौधे अर्जुन और साजा होते हैं । इसके अतिरिक्त लेंडिया, बेर अन्य वृक्षों पर भी इसका पालन संभव हैं । साल पर पाये जाने वाले प्राकृतिक टसर को "लोकल रैली“ कहते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक टसर होते हैं बहुभक्षी होते हैं उदा0 ”लारिया“ ।


3 - इरी रेशम मुख्यतः खाद्य वृक्ष अरंडी

इरी अरंडी के पौधो पर होता हैं। इसका पालन घर में ही किया जाता है। सभी सिल्क में से इसका सबसे सस्ता धागा होता हैं । उत्तरपूर्व में इसका प्रचलन ज्यादा है । यहाँ इसका प्यूपा भी खाया जाता हैं ।


4-मूंगा रेशम - मुख्यतः खाद्य वृक्ष सोलू

यह सबसे महंगा सिल्क हैं । इसका खाद पौधा Litsea polyantha तथा Machilns bombicina होता हैं । यह मुख्यतः उत्तरपूर्व में पाया जाता हैं । म.प्र. के पचमढ़ी में प्रायोगिक तौर पर इसका पालन किया जा रहा हैं ।